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उग आयी फिर दूब
           
द्वितीय दोहा संग्रह 'उग आयी फिर दूब' डॉ• अनन्त द्वारा रचित सन् 2002 में प्रकाशित हुआ। जिसमें सात सौ सात दोहों के माध्यम से डॉ• अनन्त ने समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, शोषण, मूल्य-विघटन, आतंकवाद से उत्पन्न त्रासद यथार्थ, स्वार्थपरता, अवसरवादिता, योजनाओं के खोखलेपन, नेताओं के मिथ्या आष्वासन, भ्रूणाहत्या, दहेजप्रथा, शराबखोरी, एड्स जैसे मारक रोग, व्यक्तित्व के बहुरुपियेपन, छल-छद्म और बिकाऊ न्याय व्यवस्था जैसे समसामयिक मानवद्रोही पक्षों पर अपनी सशक्त एवं समर्थ रव लेखनी से आघात किया है।
        डॉ• अनन्त के हृदयस्पर्शी दोहे भारतीय जीवन की विशेष सांस्कृतिक एवं सुख-दुख की अनुभूतियों की सरस झाँकी है:
    अरे वाह! इसको मिलीए जिजीविषा क्या खूब,
    पत्थर का भी फाड़ उर, उग आयी फिर दूब।

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